त्रि-आयामी परछाई

November 19, 2011


Post summer placements, I didn’t have much to do out here… In these idle times, the poet inside knocked on my unbolted door.
And I responded.
At times, we find ourselves all alone, struggling against the whole world. During those times too, there are people who stand by us. Who believe in us. Like our ever faithful shadow.
Ever realized you are never alone?



Here’s the complete text in hindi:
त्रि-आयामी परछाई
आधी रात  गए,
मैंने अपनी परछाई से पूछा
तुम क्यूँ हमेशा मेरे साथ रहती हो
क्यूँ मुझपर इतना विश्वास रखती हो
इतना काबिल नहीं हूँ मैं
स्वार्थी हूँ,
दुर्बल भी
खुद पर विश्वास नहीं कर पाता कभी कभी
मुझसे स्नेह रख कर,
मुझे अपनी गोद में रख कर,
हर रोज़ जो सुलाती हो मुझे,
मेरे पैरों से अपने पैर मिलाकर,
सूने रास्तों पे चलती हो जैसे
मैं सोच में पड़ जाता हूँ.
क्यूँ निस्वार्थ संगिनी बनकर
मेरे ज़बरन कठोर किये गए ह्रदय को
दुविधा में डालती हो?
आखिर क्या चाहिए तुम्हे?
मुझसे.
और परछाई मुस्कुराकर कहती है
कभी देखा है अपने आपको
किसी अनगिनत प्रकाश स्तंभों से भरे
राह पर चलते?
ध्यान दिया है की कैसे जब अनेक परछाइयां बनती हैं तुम्हारी,
मैं कैसे धूमिल सी हो जाती हूँ उन असंख्य में से एक बनकर
पर जब तुम अकेले चलते हो,
इकलौते सूरज की तपती रौशनी में,
मैं साथ देती हूँ तुम्हारा.
कुछ मदद नहीं कर सकती,
पैरों तले हूँ ना...
पर तुम्हारे साथ चलती हूँ,
तुम्हारे दुःख को बांटती हूँ.
तपिश जितनी बढती है,
मैं उतनी पास आती हूँ तुम्हारे,
क्यूंकि तुम्हे ज़रूरत होती है.
किसी की.
वैसे एक और बात है.
मैं तुम्हारी त्रि-आयामी दुनिया की द्वि-आयामी परछाई हूँ.
कभी मेरी द्वि आयामी दुनिया में आकर देखो.
तुम मेरे त्रि-आयामी परछाई हो.
सोचो, और फिर बताओ अब.
क्या तुमने मेरी परछाई बनकर,
कभी कुछ चाहा है मुझसे?
तो फिर क्यूँ शक करते हो मेरे निस्वार्थ स्नेह पर?
मैं बस चलना चाहती हूँ.
तुम्हारे साथ.
ज़िन्दगी भर.
फिर एक दिन मैं मिल जाउंगी तुम में.
सुना है आत्मा की अलग परछाई नहीं होती.

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4 comments

  1. परछाईं का अस्तित्व ही आलोक से है...

    Beautiful composition.

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