यूं ही कुछ कवितायेँ निकल पड़ी


कभी बैठा रहा जो मैं
ज़िन्दगी से निराश,
सोंचा कुछ भी करने का कोई मतलब नहीं
व्यर्थ हैं सारे प्रयास
खाली बैठे जो मिला एक कागज़ ,दिखी एक कलम
यूं ही कुछ कवितायेँ निकल पड़ी



कभी तोड़ डाली जो
सारी बाधाएं मैंने,
दिखा दिया जाकर आगे
सबकी अपेक्षाओं से
एक पल के लिए जो खिल उठा मेरा मन
भरे उत्साह के थामी मैंने कलम
यूं ही कुछ कवितायें निकल पड़ी



कभी दिखी जो मुझे तुम
कभी पास आती हुई
कभी होती दूर ,नज़रों से ओझल
अपनी ही इच्छाओं को तोड़ते माडोड़ते
पकाते हुए कुछ खयाली पुलाव
हाथ में जो आई मेरे कलम
जो जी में आया लिख दिया
यूं भी कुछ कवितायें निकल पड़ीं …





पिछली दिवाली यूं ही घर पे खाली बैठा था ,की तभी छोटी आई और कहने लगी "भैया,कोई काम नहीं है ना आपको??!!,जो ये सब लिखते रहते हो...!!" मैंने भी सोचा की बात तो सही है ,खाली समय में ही दिमाग इधर उधर भागता है और अगर कलम हाथ में हो ,तो उस पल का कुछ लिखा हुआ ,अपने पास रह जाता है |
अभी जब शिवी ने ब्लॉग का रुख थोडा सेंटी कर दिया,तो सोंचा ये पोस्ट कर दूं |

प्रणव ...



1 Comments:

Anant Agarwal said...

Hahaha.. I couldn't stop laughing. True.. kavitaein aise hi nikal padti hain, and later when you look back upon them, you can feel your own self writing them again.